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मनो-आध्यात्मिक ऊर्जा द्वारा खण्डित मानवीय
चेतना से मुक्ति
बढ़ते मनोरोगों की
आंधी एवं व्यक्तित्व-विकारों की बाढ़ वर्तमान युग की गंभीर समस्या बन गई है.
वस्तुत: हम मानवीय चेतना के गंभीर संकट से गुजर रहे हैं. हमारे देश की छह फीसदी
से अधिक आबादी किसी न किसी प्रकार से मानसिक असंतुलन की शिकार है. न्यूरोसिस, साइकोसिस, सिजोफ्रेनिया जैसे विखराव एवं बिखंडन
के परिचायक शब्द आज प्रचलित मुहावरे बन गये हैं. देश में लगभग दो करोड़ लोग
सिजोफ्रेनिया (व्यक्तित्व विघटन) की बीमारी से पीडि़त हैं तो पॉच करोड़ लोग
डिप्रेशन (अवसाद) से, जबकि यह सरकारी ऑकड़े
हैं. यदि वास्तविक पीडि़तों का अनुमान लगाया जाय तो छह फीसदी का सरकारी ऑकड़ा कई
गुना बढ़ जायेगा. कुछ समय पहले ही नई दिल्ली में भारतीय मनोचिकित्सा सोसायटी के
सम्मेलन के दौरान चिकित्सकों का कहना था कि देश की पंद्रह करोड़ आबादी किसी न
किसी प्रकार के मनोविकार की शिकार है. एक सर्वेक्षण के अनुसार 80 से 90 प्रतिशत
बीमारियॉं मानवीय चेतना की आंतरिक टूटन एवं विघटन के परिणाम हैं. यही आंतरिक टूटन
बाहरी व्यक्तित्व के बिखराव एवं विघटन के रूप में प्रकट होती है.
दरअसल मानसिक बिखराव
की इन समस्याओं के प्रति हमारे समाज में अभी खुलेपन या स्पष्टता का अभाव है.
मनोचिकित्सक के पास जाना एक तरह से पागल हो जाने का भय दिखाता है और लोग स्वयं
को इस भय से बचाना चाहते हैं. हमारे देश में मानसिक समस्याओं के उपचार को लेकर
अनिच्छा और सामाजिक कलंक भी भावना जुड़ी है जिससे देर और बहुत देर हो जाती है.
खंडित मानवीय चेतना
के इस संकट के दौर में दार्शनिक, धार्मिक एवं
वैज्ञानिक प्रत्येक स्तर पर कुछ न कुछ प्रयास चल रहे हैं, जिनकी परिसीमाएं भी बहुत स्पष्ट हैं.
दार्शनिक प्रयास प्रमुखतया बौद्धिक ऊहापोह तक सीमित हैं, इनकी व्यावहारिक उपयोगिता संदिग्ध
बनी हुई है. धार्मिक प्रयासों की सीमा उनकी रूढि़वादिता, हठधर्मिता, पूर्वाग्रहों एवं अवैज्ञानिकता के कारण
एक छोटे दायरे में सिमट जाती है. जबकि वैज्ञानिक प्रयास जैविक हेर-फेर (जैसे जीन
परिवर्तन, क्लोनिंग आदि) तक
सीमित होने के कारण अभी सतहों में ही भटक रहे हैं. वस्तुत: मानवीय व्यक्तित्व
मात्र जैविक रसायनों का संगठन भर नहीं है, बल्कि इसकी अपनी मनोवैज्ञानिक एवं उससे
उच्चतर आध्यात्मिक सत्ता भी है. मानसिक स्तर पर मानवीय चेतना तथा व्यक्तित्व
के अध्ययन, अन्वेषण एवं चिकित्सकीय
प्रयासों में आध्यात्मिक मनोविज्ञान की भूमिका नि:संदेह रूप से उल्लेखनीय है.
मनोव्यक्तित्व
उपचार एवं विकास की समग्रता के सन्दर्भ में चेतना के आधार (आत्मा) को भुला देना
ही आधुनिक मनोवैज्ञानिकों की सबसे बड़ी भूल है और इसी भूल के कारण वह अपने लक्ष्य
से दूर अन्यत्र पहुंच गया है. अंत: चेतना अर्थात् आत्म-चेतना की सत्ता का अध्ययन
इसका प्रमुख विषय होना आवश्यक है. मनोचिकत्सक अपने मरीजों का मनोकायिक स्तर तक
ही संतुलन बिठा पाते हैं, इससे आगे उनकी पहुंच
नहीं हो पाती. आधुनिक मनोवैज्ञानिक विधियों की अपनी सीमाएं और सिद्धांत हैं, जिनके द्वारा व्यक्तित्व विचारों को
एक सीमा तक ही ठीक किया जा सकता है किन्तु इसका सर्वांग उपचार यहॉ संभव नहीं है.
सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान आत्मिक क्षेत्र द्वारा ही संभव है. इस तरह आध्यात्मिक
मनोविज्ञान (साइको-स्प्रिचुअलिस्म) सुपर चेतन को व्यक्तित्व का आधार मानते हुए
व्यक्तित्व के समग्र विकास की ठोस पृष्ठभूमि तैयार करता है. अचेतन के परिष्कार
की सुव्यवस्थित प्रक्रिया द्वारा अर्थात् अचेतन मन के शोधन की स्पिरिचुअल
प्रोग्रामिंग द्वारा उस कार्य को प्रभावी ढ़ंग से आगे बढ़ाया जाता है जबकि यह
कार्य मनोचिकित्सा में आधा छूट चुका होता है.
इस तरह कहा जा सकता
है कि जहॉं से आधुनिक मनोविज्ञान की परिसमाप्ति होती है वहीं से आध्यात्मिक
मनोविज्ञान प्रांरभ होता है. अर्थात् आधुनिक मनोविज्ञान से जो कार्य अधूरा छूट जाता है 'साइको स्प्रिचुअलिस्म' अपने परामानसिक
(सुपर कांशियस) आधार पर मानव की समूची प्रकृति को अपने हाथ में लेकर उसे अपनी
पूर्णता तक ले जाता है. 'साइको स्प्रिचुलिस्म' की पद्धति एवं प्रक्रियाओं में आधुनिक
मनोविश्लेषण एवं मन: चिकित्सा की लगभग सभी
पद्धतियों का समावेश है और इससे भी बढ़ कर यह आधुनिक प्रक्रियाओं की तुलना
में अधिक सूक्ष्म, कम यांत्रिक और
विविधता में अधिक समृद्ध है. साइको स्प्रिचुअलिस्म की विभिन्न पद्धतियां मानसिक
विकास की व्यावहारिक विधियां हैं. यहॉ पर साइको स्प्रिचुअलिस्म का अर्थ आत्मा और
परमात्मा अर्थात् परम-आत्मा का अध्ययन है. आत्मा और परमात्मा केवल ज्ञान
चक्षु (इन्टेलेक्ट) से अनुभव करने की शक्तियां हैं जिनको भौतिक चक्षुओं से अनुभव
नहीं किया जा सकता आत्मा और परमात्मा के
साक्षात्कार के समय जो आनंद प्राप्त होता है वह व्यक्तिगत अनुभव, एवं विशुद्ध प्रतीति का विषय है उसे न
तो परिभाषित किया जा सकता है और न ही प्रयोगशाला में सिद्ध किया जा सकता है. इसे
इस प्रकार समझा जा सकता है कि जब ऑंखें खोलो, बहिर्मुखी बनो और प्रयोगशाला में सिद्ध
करो तभी तक विज्ञान का अस्तित्व है और जब ऑखे बंद करो,
अंतर्मुखी बनो और अपने ही अन्दर विराजमान (स्थित) परमशांतिमय परमात्मा को
ढूंढ़ो, तब ही अध्यात्मवाद
के यथार्थ को जान पाओगे.
ऑंखें बंद कर अन्दर
खोजने की प्रक्रिया में विज्ञान की पहुंच नही है ऑखें खोलने पर विज्ञान की पहुंच
और ऑखे बंद करने पर ज्ञान की पहुंच. यही आधुनिक विज्ञान और आध्यात्मिक मनोविज्ञान
की सीमा रेखा है.
पश्चिम के
मनोवैज्ञानिक मन के बहुआयामी व्यक्तित्व को तो समझने का प्रयत्न करते हैं पर
आश्चर्य इस बात का है कि मन को वश में करने की बात शायद किसी ने भी नहीं की. वे
अचेतन मन तक तो पहुंचे हैं पर ''परामन'' (सुपर कॉंशियस) की ओर संकेत कम लोगों
ने ही किया. उन्होंने मन को क्रियाशील चेतना एवं आत्मा को शांत चेतना के रूप में
देखा ही नहीं है. इसकी वजह यह भी रही है कि अधिकांश मनोवैज्ञानिक दार्शनिक होने के
साथ-साथ डॉक्टर (चिकित्सक) भी थे इसलिए उनका मुख्य उद्देश्य मानसिक चिकित्सा
पर ही रहा. मन को शांत कर सच्चिदानंद प्राप्त करने पर नहीं यहॉ सच्चिदानंद का आशय
– eternal: सत, conscious: चित तथा bliss: आनंद से है. तथापि उनका इस विषय का अध्ययन
एवं उनके विचार सारगर्भित एवं अनेक प्रकार से ज्ञानपूर्ण एवं जानने योग्य
है.
वर्तमान परिवेश में
मानवीय चेतना, विचार, इच्छा-शक्ति जीवन की आपाधापी में
प्रदूषित हो रही है. मानव के भीतर निपट अशान्ति और द्वंद पसरा हुआ है. एक शोध से
पता चला है कि हमारा मस्तिष्क प्रतिदिन 34 जी.बी. डाटा की प्रोसेसिंग कर रहा है
और यही प्रक्रिया मस्तिष्क को ओव्हर-लोड कर रही है. इस बात का हमें पता चले या न
चले, पर यह सत्य है कि
हम आस-पास की दुनियॉं से कटते जा रहे हैं. आधुनिक मानव सारे तनाव अचेतन में दबाता
जाता है और बाहर चुस्ती-फुर्ती का मुखौटा ओढ़े रहता है और यही तनाव उसके शरीर के विभिन्न
संस्थानों को कमजोर करता रहता है.
वस्तुत: मन और शरीर
का बहुत गहरा सम्बंध है. भावनाओं, विचारों और कल्पनाओं का मन से सीधा और
गहरा नाता है. यही वजह है, कि व्यक्ति की
भावनाएं और विचार उसके शरीर पर बहुत गहरा प्रभाव डालते हैं और यही विचार एवं कल्पनाएं
हमारे शरीर की जैविक तथा रासायनिक
प्रक्रियाओं को सक्रिय बनाती हैं. इन सक्रिय उद्दीपनों के माध्यम से ही 'मस्तिष्क-संदेश' कोशिकाओं तक पहुंचते हैं, जहां से पूरे शरीर में फैलकर उसे एक
सुदृढ़ चिकित्सीय गुणवत्ता प्रदान करते हैं.
आज तामसिक प्रवृतियों
(काम, क्रोध, मद मोह, लोभ आदि) के कारण ईर्ष्या द्वेष, भय, आक्रोश, लालच बढ़ते जा रहे हैं जो कि मानसिक
तनाव को जन्म देते हैं और यही भाव सभी प्रकार की मनोवैज्ञानिक बीमारियों के द्वार
हैं. यदि इनसे उपजे तनाव का शमन कर मन को शिथिल और स्थिर बनाया जाये तो मनोकायिक
और मानसिक बीमारियों से मुक्ति संभव है.
मनोकायिक अर्थात् मनोभाव
से देह में उपजे रोगों का उपचार प्रणवाक्षर-ध्यान द्वारा अचेतन-मन की शोधन क्रिया
से सभंव हैं जिससे तन और मन के स्तर पर स्वस्थ रहा जा सकता है. मात्र शारीरिक
उपचार ही रोग-निवारण के लिए पर्याप्त नहीं हुआ करता अपितु शरीर के साथ-साथ मन का
उपचार भी बहुत आवश्यक है.
वस्तुत:
प्रणवाक्षर-ध्यान मन के उपचार की दवा रहित पद्धति है जिसमें मनोरोगी के मन के
द्वार तक पहुंचा जाता है. शरीर के विभिन्न ऊर्जा केन्द्र अर्थात् महत्वपूर्ण
चक्रों के द्वारा संबंधित ग्रंथियों की कार्य पद्धति को व्यवस्थित करने में आध्यात्मिक
मनोविज्ञान की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. शरीर के भीतर जो ऊर्जा केन्द्र मंद, बंद या असंतुलित हैं उन्हें
प्रणवाक्षर-ध्यान प्रक्रिया द्वारा आदर्श रूप में सक्रिय किया जाता है. फलस्वरूप
विभिन्न जैव-रसायनों की अन्त:स्रा क्रियायें सुचारू एवं संतुलित हो जाती हैं.
अधिकांश शरीरिक रोगों की उत्पत्ति के लिये विभिन्न ग्रंथियों द्वारा स्रावित
होने वाले हार्मोन्स का असंतुलन जवाबदेह माना गया है. इस प्रक्रिया में वीटा एण्डोर्फिन, डोपामाइन, सेरोटोनिन जैसे विभिन्न हार्मोन्स के
स्राव का नियमन संभव होता है. प्रणवाक्षर-ध्यान द्वारा संबंधित ग्रंथियों को
विभिन्न आध्यात्मिक चक्रों से संबद्ध करते हुए प्रणवाक्षर अर्थात् ओम के ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत स्वरों में उच्चारण
द्वारा इन्हें सक्रिय किया जाता है. परिणाम स्वरूप आटोनॉमिक नर्व्स सिस्टम, एण्डोक्राइन ग्लैण्डस द्वारा
स्रावित विभिन्न हार्मोन्स तथा अन्य जैविक रसायनों का स्राव संतुलित हो जाता
है. मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्ध व्यवस्थित एवं सुचारू रूप से सक्रिय हो जाते
हैं. साथ ही चयापचय (मेटाबॉलिज्म) की गति नियंत्रित होती है तथा कफ, पित्त एवं वात का मन के बुनियादी गुण
सत, तम और रज के साथ
साम्य स्थापित होने लगता है. जिससे मन का भय कम होता है तथा चेतन और अवचेतन जगत
से साक्षात्कार होता है. व्यक्ति को मानसिक द्वंद, कष्ट और तनाव से जहां राहत मिलती है
वहीं उसका मानसिक कवच अर्थात् साइकोलॉजिकल डिफेंस मैकेनिज्म मजबूत होता है.
प्रणवाक्षर-ध्यान व्यक्ति के तंत्रिकातंत्र, हार्मोन्स एवं न्यूरोट्रांसमीटर को
सक्रिय कर उनका नियमन करता है और खंडित मानवीय चेतना से मुक्ति दिलाता है.
.........................
पश्चिम के मनोवैज्ञानिक मन के बहुआयामी व्यक्तिव को तो समझने काप्रयत्न करते रहे हैं,पर आश्चर्य इस बात का है कि मन को वश में करने कि
बात शायद किसी ने भी नहीं की. वे अचेतन मन तक तो पहुंचे पर "परामन
"(सुपर कोंशियश) की ओर इशारा कम लोगों ने ही किया . उन्होंने मन को
क्रियाशील चेतना एवं आत्मा को शांत चेतना के रूप में देखा ही नहीं है .
एक और ध्यान देने योग्य तथ्य है-- अधिकांश मनोवैज्ञानिक,
दार्शनिक होने के साथ-साथ डॉक्टर (चिकित्सक) भी थे , इसलिए उनका मुख्या
उद्देश्य या टार्गेट मानसिक चिकित्सा पर ही रहा . मन को शांत कर,
सच्चिदानंद प्राप्त करने पर नहीं. यहाँ सच्चिदानंद का आशय - etmal : सत,
conscious :चित्त तथा bliss :आनंद से है .
यद्यपि उनका इस विषय का अध्ययन एवं उनके विचार सारगर्भित एवं अनेक
प्रकार से ज्ञानपूर्ण एवं जानने योग्य हैं .
मन के बारे में पाश्चात्य दार्शनिकों एवं मनोवैज्ञानिकों के
विचारों के अनुसंधानों से कुछ नतीजे निकल सकते हैं ,-
एक, तो यह की की अधिकांश लोग मन के पृथक अस्तित्व को
स्वीकार करते हैं, वे मन को मिथ्या नहीं मानते .
दूसरे, वे यह भी समझते हैं की मन एक्व्यक्ति तक ही सीमित
नहीं है,उसकी शाखाओं का फैलाव दूर-दूर तक है और जड़ें, बहुत गहरी हैं .
तीसरे, मन केवल मनोवैज्ञानिक रोगों के उपचार का विषय नहीं है
, उसकी और भी अनेकानेक भूमिकाएं हैं .
चौथे, मन एक क्रियाशील शक्ति है और उसकी मौलिक सृजनात्मक
संभावनाएं अनंत हैं .l
पांचवे, मन को वश में किये जाने की बात उन्होनें उठाई ही नहीं है .
छठे,पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों के कतिपय सिद्धांत अत्यंत
महत्वपूर्ण, मार्मिक एवं लाभदायक हैं. उनके द्वारा किये गए अध्ययनों
/अनुसंधानों से यह प्रतीत होता है कि वह कभी-कभी रहस्यमय सत्य के चारों
ओर पंख तो फड-फडाते रहे, पर उनका तीर निशाने पर लगता-लगता रह गया .
मानव कि मूल प्रवृत्तियां पाशविक एवं यौन प्रवृति की हुआ
करती हैं . किन्तु सभ्य समाज में ऐसी प्रवृत्तियों को खुली छूट नहीं दी
जा सकती है . अंतत: उन्हें (प्रवृत्तियों को) दबाने का प्रयत्न किया गया
, क्योंकि आधुनिक मानव सरे तनाव अचेतन (un conscious ) में दबाता जाता है
और बाहर चुस्ती-फुर्ती का मुखौटा ओढ़े रहता है , परिणामत: तनाव उसके समस्त
आंतरिक संस्थानों को कमज़ोर कर देता है . इस दमन के फलस्वरूप अर्धचेतन
एवं अचेतन मन में गांठें पड़ जाती है , जो विभिन्न रोगों में उभरकर
सामनें आती है . जब कुछ रोगों का उपचार दवा-दारू से नहीं होता तब उनका
मूल कारण मानसिक ही मानना पड़ता है. मानसिक विश्लेषण (साइको एनेलिसिस)
द्वारा शनै: - शनै: पुरानी घटनाओं को कुरेद - कुरेद कर रोगी को उसकी छुपी
हुई कुंठित भावनाओं से मुक्त कराया जाता है, जो साइको - स्प्रिचुअल
थैरेपी द्वारा ही संभव हो पता है.इसके द्वारा उसकी (रोगी की) ग्रंथियां
पिघलने लगती हैं, और उसका रोग ठीक हो जाता है.
मन और शरीर का बहुत गहरा सम्बन्ध है, भावनाओं और विचारों का मन से सीधा
और गहरा नाता है . व्यक्ति की भावनाएं और विचार उसके शरीर पर बहुत गहरा
प्रभाव डालते है.
आज तामसिक प्रवृतियों (काम, क्रोध,मद, मोह,लोभ, आदि ) के कारण
ईर्ष्या,द्वेष,भय,आक्रोश,लालच बढ़ते जा रहे हैं. फलत: उसमे प्रज्ञा-अपराध
उत्पन्न होता है.और यही प्रज्ञा-अपराध मानसिक तनाव को जन्म देता है.
प्रज्ञा-अपराध के ही कारण तनाव उत्पन्न होता है और दीर्घकालीन मानसिक
तनाव ही सभी प्रकार की मनोकायिक बीमारियों की जड़ है. यदि इस तनाव का शमन
कर मन को शिथिल और स्थिर बनाया जाये तो मनोकायिक और मानसिक बीमारियाँ
नहीं होंगीं.
तनाव का मुख्य कारण चित्त की चंचलता है. चित्त की चंचलता के कारण
वह सामाजिक एवं पारिवारिक परिस्थितियों में अपने- आपको समायोजित कपने में
अस्मार्ठ होता है. वह अपने अन्दर निहित तनाव को अनेकों प्रकार से शारीरिक
लक्षणों के रूप में प्रकट करने लगता है, इसे ही मनोकायिक बीमारी कहते
हैं.यधपि तनाव के बारे में रोगी को चेतना या बोध नहीं होता,यह वह जान-बूझ
कर नहीं करता है बल्कि अचेतन रूप से यह होता रहता है.
मनोकायिक अर्थात मानस रोगों में , इसी अचेतन मन पर, स्प्रिचुअल
प्रोग्रामिंग की जाती है . प्रणवाक्षर-ध्यान ही वस्तुत: अचेतन मन की शोधन
क्रिया है.
मनोदैहिक विकारों से पीड़ित व्यक्तियों का भावनात्मक और
व्यावहारिक पक्ष \ गठन बहुत कुछ मिलता-जुलता होता है.उनका मन,----------
* उनका मन हमेशा सहारा ढूंढता रहता है ,
* उसमे आत्मवल एवं आत्मनिर्भरता की कमी होती जाती है,
* उन्हें क्रोध\गुस्सा अधिक आता है,
* वे फिक्रमंद किस्म के होते हैं,
* उनके मन में उमड़ते भावों\अभिव्यक्ति को व्यक्त करने के समुचित
वह तलाश नहीं पाते हैं,फलत:वह अपने-आपको विवश और वे-सहारा महसूस करते
हैं,
* दमित भावनाओं का लावा उनमे सदैव उमड़ता-सा रहता है ,
* अध्ययनों से ऐसे संकेत भी मिले हैं की अनेक मनो-दैहिक रोगियों
के मामलों में रोग की उत्पत्ति किसी गहरे व्यक्तिगत आघात से जुडी होती
है,
* जीवनसाथी या किसी अतिप्रिय की मौत अथवा किसी बड़ी दुर्घटना के
परिणामस्वरूप भी मनोदैहिक रोग हो जाते पाए गए हैं ,
* हादसे की प्रकृति से रोग की प्रकृति को जोड़कर भी, अनेकों
मामलों में देखा गया है,जैसे पति की अचानक मृत्यु के बाद स्त्री को
गर्वशाया का कैंसर हो गया,या
* शिशु के आकस्मिक निधन के बाद माँ को स्तन-कैंसर हो जाने के
मामले भी देखे गए हैं ,यधपि ऐसे कुछ संयोग ही है,कुछ शोध-चिकित्सकों की
मान्यता है की ऐसे
मामलों में, मन और तन का सम्बन्ध जुड़ा हो सकता है .
तन की रोग-निरोधक प्रणाली\ इम्यून सिस्टम पर हुए
परीक्षण एवं शोधों से ज्ञात हुआ है कि
,-----------------------------
मानसिक व्यथाओं, मन के द्वंदों का इस प्रणाली पर दुष्प्रभाव पड़ता है
अर्थात मानसिक तनाव और दवाव का तन कि रोग-निरोधक क्षमता पर विपरीत
परिणाम दिखते हैं..अंतत:रोगों से मुकावला करने की शरीर कि क्षमता कमजोर
पड़ जाती है . इस प्रकार यह स्पस्ट है कि रोग बचाव-प्रणाली का यह असंतुलन
अनेक रोगों की
उपज का महत्वपूर्ण घटक माना जा सकता है,यह शोध की दिशा भी तय कर सकता है.
.
अधिकांश चिकित्सकों का मत है कि,--- मनोदैहिक विकारों
के उपचार में तन और मन का उपचार किया जाना आवश्यक है . रोगी के मन में
जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण तथा भावनात्मक संतुलन बनाया जाकर बहुत
सी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है .जीवन की हताशाओं और दुःख-विषादों
को मन में कैद कर रखना या उन्ही के बारे में ही सोचते रहना, ठीक नहीं
है.अत:भावनाओं कि घुमड़ अर्थात भावनाओं के उफान या सैलाव को बाहर आने का
रास्ता मिलजाये , तो मन खुश/सुखी और तन स्वस्थ रखा जा सकता है.
मनोरोग एक सामाजिक समस्या
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अवसाद या नैराश्य के भाव न तो
किसी बाहरी विषाणु , जीवाणु या परजीवी के कारण से होता है और न ही यह
मनुष्य को एकाएक अपनी गिरफ्त में लेता है . वास्तव में इसके बीज तो
मनुष्य के अन्दर चिंता, उदासी, भय और असफलता जैसे भावनात्मक कारकों में
विद्वमान होते हैं. और यही बीज मन को कहीं गहरे में आहत करते हैं. मन को
चोट पहुँचाने वाले ऐसे सभी करक व्यक्ति की सोच को ऐसे चक्रव्यूह में फंसा
सकते हैं जहाँ उसे चरों ओरहताशा और नैराश्य नजर आता है. यही
सिद्धांत/प्रक्रिया उसे धीरे-धीरे स्थायी रूप से मनोरोगी बनाती है. इस
प्रकार हम देखते हैं कि मनोरोग मानसिक कमजोरी का लक्षण या चिन्ह नहीं
वल्कि स्वास्थ्य का का मुद्दा भी भी है, इसे सामाजिक समस्या मानते हुए
चिकित्सा की विभिन्न विधाओं के जानकारों के साथ मिलकर हल किया जाना
चाहिए.
कर्ज, डर, मनमुटाव , अवहेलना ,एकाकीपन,अपराधबोध, आघात,
प्रतिघात, प्रतिशोध, निराशा, क्रोध, प्रेम में असफलता, झगडे आदि कारक
मनोरोगों एवं अवसाद के लिए जवाबदेह होते हैं. भीषण अवसाद के दौर में
व्यक्ति आत्महत्या का भी प्रयास कर सकता है.
चिंता और तनाव नए ज़मानें में आमबात हो गई है,लेकिन इसकी अधिकता से
व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाता है.वेतानिकों नें एक ख़ास तरह की जीन को
डिप्रेशन के लिए ज़िम्मेदार बताया है.ब्रेन इमेजिंग के अध्ययन से इसकी
पुष्टि हुई है.यह जीन मूड रेगयूलेटिंग सर्किट को कमजोर बनता है. भावनाओसे
सम्बंधित मस्तिष्क में स्थित 'एमिग्डाला' और 'सिंगयूलेट'भी डिप्रेशन के
लिए ज़िम्मेदार इस जीन से प्रभावित होते है. यह जीन मूड रेगुलेटिंग
सर्किट को कमज़ोर कर देता है . इसलिए व्यक्ति पहले चिंता और फिर डिप्रेशन
का शिकार हो जाता है.इस ख़ास जीन का असर भावनाओं , खासकर डिप्रेशन पर
निश्चित रूप से होता है.
डिप्रेशन का मर्ज आगे चलकर उच्च रक्तचाप और विभिन्न ह्रदय रोगों का
कारण बनता है.
डिप्रेशन एक ऐसा मनोरोग है,जिसमें व्यक्ति हमेशा निराशवादी विचारों से
घिरा रहता है, वह उदासी में ही डूबा रहता है.
शोधार्थियों की राय में डिप्रेशन का स्वरुप जितना गंभीर होगा,
उच्चरक्तचाप और ह्रदय रोग होने की जोखिम उतना ही ज्यादा बढ जाती
है.डिप्रेशन मर्ज के चलते धमनियों के अन्दर अवरोध पैदा होने लगता है,जो
आगे चलकर ह्रदय रोगों का कारण बनता है.
मनोरोगों का कारण जैव रसायनों (Bio Chemicals) का असंतुलन है,को कुछ
अनुवान्सिक कारणों से भी होता है.कुछ में पारिवारिक एवं रासायनिक
परिवेशगत कारण होते है तो कुछ में जीवन की विषम परिस्थितियों से उपजी
अवचेतन मन की कुंठाएं एवं द्वन्द .
हमारा मंसिक्स्वस्थ जीन संरचना पर भी बोहोत अधिक निर्भर करता है, जो
गर्भावस्था के प्रथम चरण में निर्मित होती है.तनाव विश्व की ज्यादातर
बिमारियों का जनक है.डिप्रेशन जेसी खतरनाक बीमारी तनाव के चलते ही होती
है.
मनुष्य के अपने मन की विकृतियाँ ही मानसिक रोगों का कारण होती है. अपनी
सामान्य अवस्था से विचलित होना ही विकृति कहलाती है.मन की विकृति के कई
लक्षण हैं ,जेसे-
अत्यधिक चिंत या बेवजह का डर ,
बैचेनी और अनिद्रा ,
आवेशों की अधिकता ,
अवास्तविकता अथवा काल्पनिक विचारों में खोए रहना,
असामान्य व्यव्हार ,
अपनी और अपने आश्रितों की देखभाल में लापरवाही,
कमजोरी,थकन,निराशा और निरर्थकता का एहसास (ऊब,अलगाव,घृणा) भी अवसाद
के लक्षण हैं.
इसके अतिरिक्त क़र्ज़,मन
मुटाव,एकाकीपन,अपराधबोध,कुंठा,
असफलता,चिंता,भय,उदासी,निराशा,
बीज होते हैं . तनाव - ग्रस्त व्यक्ति को अधिनिक चिकत्सा विज्ञानं के
अनुसार डिप्रेशन, दुश - चिंता (anxiety),न्यूरोसेस एवं सिजोफ्रेनिया जेसे
रोगों से गुजरना पड़ता है. ह्रदयघात एवं हाईपरटेंशन (एच .बी. पी.) हमारी
रोज़मर्रा की छोटी-मोटी टेंशन का ही विकसित रूप होता है. एग्जिमा कुंठा /
इर्ष्या का विकसित रूप है.
अधूरे व्यवस्था (unfixed-bussiness) ~> अव्यक्त क्रोध ~> व्यक्त
क्रोध ~> तनाव ~> सतत तनाव ~> अवसाद ~>
मानसिक ~> शारीरिक + भावनात्मक बीमारियाँ ~> ह्रदय रोग ~>
उच्चरक्तचाप , मोटापा , मधुमेह , अस्थमा आदि .

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